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Sunday, February 13, 2011

वक़्त के हातो मजबूर ...


ज़िन्दगी वैसे ही एक पहेली है ...
जिसको सुलझाने में इंसान ....
वक़्त बे वक़्त कोई इम्तिहान...
देने में लगा रहता है ...
सिवाय हेरान और परेशान होने के
करे तो क्या करे ..

फिर उसमे आ जा के ...
रिश्तो के अनसुलझे  तार ...
जिनको सुलझाने  में वक़्त के हातो ....
मजबूर एक कठपुतली कि सी  ...
ज़िन्दगी गुजार रहा इंसा ...
सिवाय हेरान और परेशान होने के
करे तो क्या करे ..

ऐसे में गर इश्क हो जाये तो ....
बावरे मन को कोई क्या समझाए कि
ज़रूरी नहीं कि मन जो चाहेगा वो ...
उसको मिल ही जायेगा फिर ....
सिवाय हेरान और परेशान होने के
करे तो क्या करे ..

ज़िन्दगी न जाने क्या क्या दिखलायगी ...
तुम हम तो बस एक कठपुतली है  ...
जो वक़्त के हातो मजबूर है ...
सिवाय हेरान और परेशान होने के
करे तो क्या करे ..

श्रुति मेहेंदले 13th फेब्रुअरी  2011

Sunday, August 29, 2010

मेरी माँ



तुम जैसी भी थी ,थी तो मेरी माँ ...
आज तुम इस जहा में नही तो क्या ..

तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता ...
आज जब मुड़ के पीछे देखती हू तो ...

वो तेरी छोटी छोटी बाते याद आती है ...
अब उन छोटी छोटी बातो के लिए भी तरसना ..

कभी तो तुमसे हर बात पे बहस करके लड़ना ...
आज उस पलो को फिरसे जीने  के लिए तरसना ..

जो कभी मुझको तुम्हारा टोकना लगता था ...
आज उस टोकने को भी तरस गई हू ...

सोचा कि ये क्या बताने वाली बात है पर ...
आज गम इस बात का है कभी तुझसे कहा नहीं की ...

तुझसे कितना प्यार करती हू ..

श्रुति मेहेंदले  29th अगस्त 2010

Saturday, January 23, 2010

इत्तफाक कि बात है ....





ज़िन्दगी  के काँरवा में  कई  मोड़  आये .....
और  हम  उनसे  गुज़रते  गये .....
इत्तफाक   कि  बात  है .....
जिस  मोड़  पे  तुमसे  रूबरू  हुए ....
हमारे  कदम  वही  थम  गये ....
जैसे  मुसाफिर  को  अपनी  मंजिल  मिल  गई ...


श्रुति मेहेंदले 21st जनुअरी 2010

Tuesday, December 8, 2009

ख़ामोशी !!!! उफ़ ये ख़ामोशी ....

 ख़ामोशी  !!!!उफ़ ये ख़ामोशी ....


अपनेआप में ही कुछ गुमसुम सी ..
ये ख़ामोशी ....
चुपके से कुछ कह रही ...
ये ख़ामोशी ...
कुछ लफ्जों को तरसती ...
ये ख़ामोशी ...
हम तो खामोश है तुम्हारी ख़ामोशी में..
जान !!! पर तुम क्यों हो खामोश से ..


ख़ामोशी  !!!!उफ़ ये ख़ामोशी ...


वक़्त वक़्त कि बात है आज तुम हो खामोश ...
ना चाहते हुए हम भी दे रहे साथ...
तुम्हारा इस ख़ामोशी में 
चलने दो ये सिलसिला ख़ामोशी का ...
आज ये ख़ामोशी तुम्हारी चाह है ...
कल न जाने यही ख़ामोशी ....
तुम्हारी मज़बूरी न बन जाये...


ख़ामोशी  !!!!उफ़ ये ख़ामोशी ...


वक़्त ने आज तक ...
किसी का इंतजार नहीं किया ....
कब ये करवट बदले और हम...
 तुम्हारी ख़ामोशी में गुम ..
इस जहा से अलविदा हो ...
फिर न कोई तरसेगा तुम्हारे इन कुछ लफ्जों को ...
फिर तुम और तुम्हारी ये ख़ामोशी ....
जी भर के खेलना ये ख़ामोशी का ये खेल....


ख़ामोशी  !!!!उफ़ ये ख़ामोशी ...


श्रुति मेहेंदले 8th दिसम्बर 2009

Tuesday, October 13, 2009

तुम इसे जीने तो दो.....

तुक्या आये ज़िन्दगी में कि...
कुछ ज़िन्दगी का रुख ही बदल गया ....
जाने अनजाने ही सही कभी सोचा ना था...
कि इतनी शीदत्त से किसी को अपना मानेगे ....
जिस तरह तुमको माना है अपना ...
तुमने वो भी सिखा दिया ....


ये रिश्ता जो हमारा है वक़्त ने अपनेआप बनाया है ...
ये दिल से जुडी बात है इसे ना तुम झुटला सकते हो न मै...
ये वही समझ पायेगा जो इस दौर से गुज़रा है ...
कोई यकी करे या न करे उम्मीद सिर्फ तुम से है ...
कि तुम तो इस बात को ना झुठलाओ ...


जहा एक ख्याल भी तुमसे अलग होने का ...
दिल में एक दर्द का गुबार उठता है ....
वही तुम न जाने कैसे सरलता से ...
अलग होने कि बात कह जाते हो....




माना कि ज़िन्दगी में हमारे रस्ते है अलग...
मगर फिर भी दिल को तो दिल से राह है ....
तो फिर हम या तुम क्यों इस बात से इनकार करे ...
ये रिश्ता वक़्त के साथ साथ अपनेआप जी लेगा ...
जान तुम इसे जीने तो दो......... 

श्रुति मेहेंदले 13th ओक्टुबर 2009

दिल के रिश्ते ....

कभी कभी किसी का ज़िन्दगी में आना
एक अजीब सा सुकून देता है ....
और ना चाहते हुए भी....
एक बेनाम सा रिश्ता बन जाता है ...
भले ही समाज के लिए....
रिश्तो का नाम होना ज़रूरी है ...
पर दिल के रिश्ते समाज के मोहताज नहीं ....
जब भी किसे से जुड़ गया तो .....
जन्मो तक नहीं टूटते ....
कभी कभी तो खून के रिश्ते भी फीके पड़ जाते है ...
इन दिल के रिश्तो के सामने ....


श्रुति मेहेंदले 13th ओक्टुबर 2009

मन कि ये दुविधा मनस्थिति......


मन कि ये  दुविधा मनस्थिति......


कभी अपनी ही परछाई से कतरा के मुह मोड़ लेना तो ....
कभी इसी परछाई में अपनेआप को समेटने कि चाह ..


कभी खून के रिश्ते ही आपनापन खो दे तो ...
कभी बेनाम रिश्तो में अपनेपन कि चाह होना...


श्रुति मेहेंदले 13th ओक्टुबर 2009


Sunday, October 11, 2009

गहराई ....




सागर में कितना पानी है कोई नाप सका है भला ? 
वैस ही प्यार कि गहराई नापना मुश्किल है ...

सागर में कोई समाना  चाहे तो समां जाये ...
वैस ही गर कोई प्यार में समाना  चाहे तो समां जाये ..

सागर के कितने अनगिनत राज है ...
जो कि उसमे डूब के ही जान सकते हो ...... 
वैस ही प्यार के भी अनगिनत पहलू  है  ......
जो कि उसमे डूब जाने वाला ही महसूस कर सकता है ...


श्रुति मेहेंदले 9th सितम्बर 2009 

Sunday, October 4, 2009

ख़ुशी अधूरे ख्वाब कि जो जी रही हु..



ख़ुशी अधूरे ख्वाब कि जो जी रही हु....
जानती हु कि ये ख्वाब न होगे पुरे ....
पर इस ख्वाब को अधुरा ही जीना चाहती हु ....

किसी को इस कदर मानोगे अपना....
कि वो जीवन में तुम्हारे लिए अधुरा ही सही ..
लेकिन फिर भी पूर्णता का अहसास दे ...

मैंने जान लिया है कि कुछ ख्वाब होते है अधूरे ....
उनको अधूरे ही जी लेना चाहिए ...
दिल को एक सुकून का एहसास होता है ..

जानती हु मन में एक डर का एहसास भी होता है ...
कि कही ये ख्वाब अधूरे ही सही पर टूट ना जाये ...
ख्वाब कोई भी हो टूटने पर दर्द का एहसास तो होता है ....

खुदा महफूज़ रखे इन ख्वाबो को ....
क्योंकि कभी कभी अपनी ही नज़र लग जाती है ....
अपने ही ख्वाबो को पिर वो अधुरा सा ही क्यों ना हो  .....


अधूरे ख्वाब है जो जी रही हु लकिन सच में खुश हु ....


श्रुति मेहेंदले  3rd ओक्टुबर  2009  



Thursday, September 10, 2009

हाथ से फिसलता वक़्त...


छोटी सी है ज़िन्दगी ...
फिर भी जाने क्यों लोग...
हाथ पे हाथ धरे ...
वक़्त कब करवट बदलेगा ....
इसका  इंतजार करते है... 

वक़्त अभी है आज जी लो ..
हर खवाहिश जो पूरी कर सको कर लो ...
कल किसने देखा है ....
फिर सिर्फ हाथ से वक़्त...
के फिसलने का गम  रह जाएगा ...

बीता वक़्त न कभी लौटा है ना कभी लोटेगा ... 
श्रुति मेहेंदले  10th सितम्बर  2009
फिसलता

Wednesday, September 9, 2009

भरोसा है उम्मीद पे,दुनिया इसी पे कायम है ..

ना जाने क्यों हम भी ...
खुले रखते है दिल के किवाड़ ....
चाहते है अपने प्यार को बसाना इसी दिल के घरोंदे में ....
भरोसा है उम्मीद पे, दुनिया इसी पे कायम है ....


ना जाने क्यों हम भी...
समज न  पाते कि जिसको माना है प्यार  ...
क्या वो बसायेगा बसेरा इस दिल के घरोंदे में ........
भरोसा है उम्मीद पे, दुनिया इसी पे कायम है ....

ना जाने क्यों हम भी..
चाहतो के पर लगाके उड़ते है जबकि हकीकत में..
 मुमकिन नहीं सभी ख्वाहिशे पूरी होना फिर भी........
भरोसा है उम्मीद पे,दुनिया इसी पे कायम है ..


फिर मै तो एक छोटी सी जान हु......


श्रुति मेहेंदले 9th सितम्बर 2009       

बस एक एहसास है जो......



जाने कैसे तुम से मुलाकात हुई और....... 

बस  एक  एहसास  है  जो,
अब  तो  दस्तक  दे  के  बस  गया  है,
जाने क्यों इस दिल में 

जाने कैसे तुमको ये दिल दे बैठे और....
बस  एक  एहसास  है  जो, 
अब  तो  मिटाए  ना  मिटे,
जाने क्यों इस दिल से 

जाने कैसे तुमसे एक कशिश सी  है और .........
बस  एक  एहसास  है  जो ,
अब  तो  समझाए  ना  समझे,
जाने क्यों इस दिल को  

जाने कैसे तुम में ज़िन्दगी उलझ सी गई है और.......
बस  एक  एहसास  है  जो ,
अब  इस  उलझन  में  भी  सुकून  है  पता ,
जाने क्यों इस दिल में 

श्रुति मेहेंदले  9th  सितम्बर 2009

ज़िन्दगी में कभी मुड़ के देखोगे तो...



जब हम मिले थे तो .....
साथ ना चलते हुए भी एक दुसरे के साथ थे ....

ना जाने कब पता ही नहीं चला ...
तुम न जाने क्यों आगे निकल गए .....

कभी तो बीते दर्द को याद करके ....
तो कभी आने वाले दर्द के एहसास से ...

तुम इस दर्द के बहाने मुझे भुलाना चाहो....
शायद ये मुमकिन भी हो .....

लकिन ज़िन्दगी में कभी मुड़ के देखोगे तो .....
मुझे ज़रूर इंतज़ार करते पाओगे ....

ये पयार ना होगा कम....
क्योंकि मैंने प्यार शर्तो पे नहीं किया .....  


श्रुति मेहेंदले  27th अगस्त 2009

Friday, September 4, 2009

ज़िन्दगी हर वक़्त इम्तिहान है लेती ......



ज़िन्दगी भी एक कशमकश है पहेलियों की ...
जाने क्यों हर वक़्त इम्तिहान है लेती ....

ज़िन्दगी ना जाने क्यों है पहेलियों का पिटारा ..
कभी रिश्तो की अनचाही पहेली तो ...
कभी समाज के खोखले रिवाजों की पहेली....

ज़िन्दगी ना जाने क्यों अक्सर इम्तिहान है लेती ...
तुम भी एक पहेली हो मेरी ज़िन्दगी की ...
जान क्या तुम भी लोगे मेरा इम्तिहान ....

Thursday, September 3, 2009

जाने क्यों लगता है तुम मेरे हो....


तुम मेरे हो,जाने क्यों फिर भी मेरे नहीं ....

जाने क्यों तुम ज़िन्दगी की ख़ुशी हो,
जाने क्यों फिर भी तुम मेरे नहीं ....

जाने क्यों तुम से है डोर जुडी ,
जाने क्यों फिर भी तुम मेरे नहीं ...

जाने क्यों तुम से है एक रिश्ता,
जाने क्यों फिर भी तुम मेरे नहीं ....

जाने क्यों लगता है तुम मेरे हो,
जाने क्यों फिर भी तुम मेरे नहीं....

क्या सच में तुम हो मेरे ?

Sunday, August 30, 2009

इंतजार के भी अपने दो पहलु है ....



इंतजार के भी अपने दो पहलु है ....
एक उम्मीद का तो दूसरा दर्द का ....

इंतजार की हद तो तब है जब ....
उम्मीद दामन छुडाने की कशमकश में हो और ...
तुम दर्द की चादर में लिपटे उम्मीद का दामन थामे रहो ....

इंतजार की इन्तहा तो तब है जब ....
उम्मीद ने दम तोड़ दिया है और....
तुम दर्द की चादर में लिपटे फिर भी इंतजार करो ....

इंतजार में हम दर्द के नशे में डूब....
नाउमीद से भी उम्मीद की अपेक्छा करते है ....

Saturday, August 29, 2009

बस इसे इमानदारी से निभाने की ज़रूरत है......

प्यार शर्तो का मोहताज नहीं ...
बस इसे इमानदारी से निभाने की ज़रूरत है...

ये एक एहसास है जो बस हो जाता है ....
जिसको किसी की मंजूरी की इजाज़त नहीं ...

प्यार तो सिर्फ एक इबादद है...
जब किसी से होता है तो ....
बिना किसी शर्त के होता है ....

इस बात को समझने के लिए ...
ज़रूरी है की किसी से आप खुद ...
बिना शर्त प्यार करो ....
भले वो किसी से भी हो ......

प्यार शर्तो का मोहताज नहीं ...
बस इसे इमानदारी से निभाने की ज़रूरत है.....

Monday, August 24, 2009

एक सुकून की ज़िन्दगी को तरसती नारी ....



एक सुकून की ज़िन्दगी को तरसती नारी ..
जिसकी अपनी ही व्यथा है न्यारी ...
रोज़ मरती है और रोज़ जीती है ...

कभी तो इस पुरुष प्रधान समाज में ...
अपने ही वजूद को साबित करने की..
जदोजहद में ...

कभी तो घर की चौखट के अन्दर ...
अपने ही अस्तित्व को समेटने की ...
कशमकश में

व्यथा और भी गंभीर होती है ...
जब नारी ही नारी को परखती है ...
अपनी ही अलग अलग कसौटी पर ...

जाने कब ये सिलसिला ख़त्म होगा...
रोज़ मरने का और रोज़ जीने का ....

एक सुकून की ज़िन्दगी को तरसती नारी ...
श्रुति मेहेंदले 

Thursday, August 20, 2009

ख्वाहिशो की उड़ान को समज पाना मुश्किल है..

ख्वाहिशो की उड़ान को समज पाना मुश्किल है...

यहाँ इन्सान इन्सान को समज नहीं पता ....
ये तो बस ख्वाहिशो की उड़ान है....
जहा रोज़ इन्सान अपनी ही ...
उम्मीदों के पर काटने को मजबूर है ...
ये तो बस ख्वाहिशो की उड़ान है...

ख्वाहिशो की उड़ान को समज पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है..

Wednesday, August 19, 2009

ये सफ़र इक नया सा ...

ये सफ़र इक नया सा ....
कुछ लोग अपने से तो कुछ पराये से ....

ये राहे भी अब नयी सी .....
कुछ तो जानी सी और कुछ अनजानी सी ...

ये निघाहे मंजिल को तलाशती ......
कुछ पास आती तो कुछ ओझल होती ....

सफ़र तो चलने का नाम है ....
ये हमसफ़र का ही पता नहीं.....

Welcome to Sentiments

When we connect to any one it is the Sentiments we have with each other that is reflected