ज़िन्दगी में तुम आये .....
तो तुमसे है चाहत ...
जाने कबसे है ...
ये चाहत के सिलसिले ...
मुक्कद्दर को न था ये मंज़ूर ..
या फिर तुमको
ये नहीं जान पाई ...
लकिन फिर भी ...
ज़िन्दगी गुज़र रही है ...
तेरी चाहत में ....
अब आलम ये है कि .....
जी रहें है ...
तुमको ना चाहने कि जुस्तजू में ...
तुम क्यों हो ख़फा ज़िन्दगी से
ये तो मैं नहीं जान पाई ...
पर इतना जानती हु कि ......
तुम हो मेरे ही .....
जाने कितने जनमों से ...
खुदा ही जाने ..
फिर क्यों है ...
ये दूरिया और तुम ...
कुछ अनजाने से ....
श्रुति मेहेंदले 19th मे 2010
3 comments:
ज़िन्दगी में तुम आये .....तो तुमसे है चाहत ...जाने कबसे है ...ये चाहत के सिलसिले ...मुक्कद्दर को न था ये मंज़ूर ..या फिर तुमको ये नहीं जान पाई ...लकिन फिर भी ...ज़िन्दगी गुज़र रही है .....
इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....
बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है
काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर
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